Katha

” श्री बाबा लालू जसराय देवस्य स्वर्णमय पावन इतिहास” Src: Delhi Temple

ये पवित्र इतिहास जिसे लेखनी बध्द करने जा रहे है, लगभग दो हज़ार वर्ष प्राचीन है| यह पावन गाथा हमने अपने पूर्वजो द्वारा श्रवण की है और उनका भी यही कथन है की इसे हमने अपने पूर्वजो द्वारा श्रवण किया है और यही कथा हम अपने सेवको को सुनाते आ रहे है ताकि सेवको की श्रद्धालु पीढी प्रचालित प्रथा के अनुसार इसको अपना कर्तव्य मान कर इसका अनुसरण करती रहे| परंपरागत यह कथा भी शास्त्रोक्त है| “महाजनों येन गत से पथः” अर्थात महापुरुष (पूर्वज) जिस मार्ग पर चले है वही माननीय है| श्रद्धेय पूर्वजो से हमने यह प्रसंग भी सुना है की प्रातः स्मरणीय सारस्वत विप्रकुल भूषण मान्यवर पंडित चन्द्र मुनि जी महाराज के वंशजो ने एक पावन ग्रन्थ हिंगलाज पुराण की हिंदी कविता के रूप में रचना की थी| इसमें प्रराम्भा आदि शक्ति जगदम्बा की स्तुति लिखी है तथा इससे बाबा जी के पावन इतिहास का वर्णन भी किया है जिस की कथा हमारे पूर्वज श्री श्रावण कृष्ण नौमी, दशमी के पवित्र महोत्सव पर सुनाते रहे है| देश के विभाजन हो जाने के कारण वह पुस्तक हम साठ नहीं ला सके वह पुस्तक मंदिर में ही सुरक्षित थी तथा बाबा जी के मंदिर मे|
कथा प्रसंग- इस कथा का सम्बन्ध पंजाब प्रान्त के विशाल नगर श्री दीपालपुर से है| दीपालपुर को इतिहासकारो ने पाकिस्तान का नाम भी दिया है यह स्थान जिला मिटगुमरी रेलवे स्टेशन ओकाडा से लगभग सोलह मील की दूरी पर स्थित है यह जमीन स्तर से ३०-४० फुट की ऊंचाई पर बसा हुआ था| इसके चारो ओर बड़े-बड़े चार प्रवेश द्वार थे| सारा नगर मानो एक किला प्रतीत होता था| नगर के चारो ओर सुरक्षा के लिए एक गहरी खाई थी जिसमे पानी भरा रहता था जिसके भरना विशेष अब भी देखने को मिलते है| इस नगर के राजा महान तेजस्वी क्षत्रिय वंशीय श्री चन्द्र जी थे| यह राज्य पंजाब, सिन्धु सक्खर एवं शिकारपुर तक फेला हुआ था| राजा श्री चन्द्र के दो भाई नर सिंह एवं प्यारे मुलतान में रहते थे| मिंटगुमरी गजट में इस का वर्णन किया गया है की सूर्यवंशी खन्ना क्षत्रिय दूर-दूर तक फेले हुए थे जो काबुल कंधार तक बस गए| काबुल की एक पहाडी पर श्री बाबा जी का मंदिर सुशोभित था| वहां से खन्ने क्षत्रिय चोटी देने के लिए दीपालपुर पहुचे थे|
राजा श्री चन्द्र ने पुत्र संतान प्राप्ति के लिए तीन विवाह किये फिर भी देव वंस पुत्र की प्राप्ति न हुई | इसीकारण बे चिंतित रहते थे की इस विशाल राज्य का उत्तराधिकारी कोन होगा | उनके कुल पुरोहित विप्रवर सारस्वत भूषण परम आदरणीय पंडित चंद्रमुनी जी महाराज झिन्गड़ नित्यप्रति अपने यजमान राजा श्री चन्द्र के महलो में उन्हें आशीर्वाद देने के लिए पधारते थे . राजा बड़े सम्मान पूर्वक स्वागत करता हुआ उनको बैठने के लिए आशन प्रदान करता | एक दिन अपने नियमानुसार विप्रवर राजा के महल मैं पधारे तथा उन्होंने राजा को उदासीन मुद्रा में देखा | राजा ने पूर्ववत पुरोहित जी का आदर किया | बैठने के लिए आसन दिया और बड़ी श्रद्धा से उनके चरण छुए पुरोहित जी आसन पर विराजमान हो गए | पुरोहित जी को राजा की उदासीनता का कारन ज्ञात हो गया क्योकि वे त्रिकालज्ञ थे परन्तु फिर भी उन्होंने राजा को उसकी उदासी का कारन बताने के लिए आग्रह किया | राजा ने उदासी का कारन बताने में कुछ संकोच किया लकिन पुरोहित जी के बार बार पूछने पर राजा विनम्र भाव से हाथ जोडकर कहने लगे | हे विप्रवर , आप तो सर्वज्ञ है | मेरी उदासी का कारन आप को ज्ञात हो चूका है | मैंने पुत्र संतान की प्राप्ति के लिए तीन विवाह भी किये लेकिन फिर भी पुत्र रत्न की प्राप्ति से वंछित रहा | मुझे तो केवल मात्र एक ही चिंता है , की मेरे पश्चात् इस राज्ये को कोन संभालेगा ? आप महलो में किसके पास आया करेंगे ? यह कहते हुए राजा व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर गया | पुरोहित जी ने राजा को उठा कर ह्रदय से लगाया और सान्तवना देते हुए कहने लगे , राजन धैर्य रखो | मैं विदबदजनो से परामर्श करके अवश्य ही कोई उपाय करूँगा, जिससे आपको पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी| राजा ने पूर्ववत अपने पुरोहित जी को भेंट पूजा देनी चाही किन्तु राजा के शुभचिंतक पुरोहित जी ने प्रतिज्ञा की कि मै अब तभी तुम्हारे राजमहल में आऊंगा जब तुम पुत्र संतान वाले हो जाओगे और यह भेंट पूजा भी मै तभी
n स्वीकार करूँगा|
यह कह कर पुरोहित जी वहां से प्रस्थान कर गए एवं सीधे अपने पूज्य गुरुदेव दयाल पुरुष इच्छाधानी (जो अपने तपोबल से अपना चोला भी परिवर्तन करने में समर्थ थे, जिनका आश्रम दीपालपुर से दो मील कि दूरी पर था, जिनके आश्रम के नज़दीक एक अति रमणीय तालाब था, तथा जो बाबा छ्ज्जल देव के नाम से प्रसिद्ध थे) के पास पंहुचे | जिस समय पंडित चन्द्र मुनि जी वहां पहुचे तो दयाल पुरुष अपनी समाधि में लीं थे| पुरोहित जी आदर पूर्वक गुरुदेव के चरणों का स्पर्श कर के बैठ गए| थोडी देर के पश्चात् बाबा छ्ज्जल देव जी ने अपने आसन से उठकर तालाब में डुबकी मेंडक का रूप धारण किया| तत्पश्चात् पुनः तपस्वी का रूप धारण कर आश्रम में अपने आसन पर विराजमान हो गए| अपने सामने पुरोहित जी को बैठे देखकर उनसे आने का कारण पूछा| तब पुरोहित जी ने करबद्ध प्रार्थना करते हुए कहा की हे त्रिकालज्ञ गुरुदेव मै नित्यप्रति के अनुसार आज राजा श्री चन्द्र के महलो में गया| राजा बहुत उदास थे| राजा की उदासीनता का कारण पूछने पर उन्होंने बताया की तीन विवाह करने पर भी उसे पुत्र रत्न की प्राप्ति नहीं हुई है| उनके पीछे राज्य का उतराधिकारी कौन होगा? आप महलो में किसके पास आया करेंगे? कौन आपका स्वागत करेंगा? ऐसा कहते हुए राजा ने मुझे भेंट पूजा अर्पण की लेकिन मैंने उसे स्वीकार करने की बजाये प्रतिज्ञा ली की हे राजन| अब मैं भी तभी आप के महल में आऊंगा जब आपको पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी| अतः गुरुदेव इसी कारण मै आप की शरण में आया हूँ आप कृपा करके कोई उपाय बताये| यह सुनकर ऋषि दयाल पुरुष, समाधि अवस्था में चले गए| थोडी देर बाद समाधि खुलने पर कहने लगे की हे विप्रवर राजा के भाग्य में संतान नहीं है यदि आपने अपनी प्रतिज्ञा की पूर्ति करने की इच्छा की है तो आप को भगवती हिंगलाज प्राम्भा शक्ति जिनका पवित्र स्थान यहाँ से बड़ी दूरी पर स्थित है, घने जंगल में जहाँ भगवती की अखण्ड ज्योत जग रही है यजमान के लिए पुत्र प्राप्ति का संकल्प लेकर इस मन्त्र का जाप प्रारंभ करे|
मन्त्र : ॐ सर्वा बाधा विनिर्मुक्तो , धनधान्य सुतान्वित: | मनुष्यों मत् प्रसोदन भविष्यति न संशय: || आप के ऐसे अनुष्ठान से भगवती माँ यदि प्रसन्न हो जाए और अपने दो वीर आप को राजा के लिए संतान रूप में प्रदान कर दे तो आपकी तपस्या सफल होगी तथा आपके यजमान राजा श्री चन्द्र को देव संतान प्राप्त हो जायेगी| तपस्या अति कठिन है | साहस पूर्वक यदि ऐसी तपस्या कर पाओगे तो आपकी प्रार्थना स्वीकार कर भगवती हिंगलाज आप को वरदान देगी| मै भी इस कार्य में आपकी सहायता करूँगा| पूर्वजो के द्वारा यह भी श्रवण किया हैं की दयालु पुरुष जी शेष नाग का रूप धारण करके माँ हिंगलाज के स्थान पर पहुचे थे| मान्यवर पुरोहित जी ने आदरणीय गुरुदेव का आदेश स्वीकार कर श्री हिंगलाज मंदिर की ओर प्रस्थान किया| मार्ग अति कठिन था परन्तु फिर भी पुरोहित जी साहस पूर्वक मंदिर में पहुँच गए| राजा श्री चन्द्र को पुत्र संतान की प्राप्ति हो, ऐसा संकल्प लेकर भगवती जगदम्बा की प्रसन्नता के लिए पूर्वोक्त मन्त्र का विधिवत् जाप प्रारंभ कर दिया| पुरोहित जी दिन-रात मन्त्र का जाप करते हुए, जंगल के फल-फूल खाकर जीवन निर्वाह करने लगे| ग्यारह वर्ष की कठिन तपस्या करने के पश्चात् वरदायिनी भगवती प्राम्भा शक्ति देवी माता हिंगलाज प्रकट हुई| उन्होंने पुरोहित जी से कहा ‘वरमब्रूहि’, मै आपकी तपस्या पर प्रसन्न हूँ| पूरोहित जी ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि मेरे यजमान राजा श्री चन्द्र के घर पुत्र कि उत्पत्ति हो, यही मेरा संकल्प है| यही आपसे वरदान चाहता हूँ| पूरोहित जी कि बात सुनकर माता हिंगलाज ने कहा कि हे ब्राह्मण, राजा के भाग्य में संतान नहीं है, आप कोई अन्य वर मांगे| परन्तु पुरोहित जी कहने लगे मुझे तो किसी दूसरे वरदान की इच्छा नहीं| मुझे तो एक मात्र यही वर चाहिए| तत्पश्चात् भगवती अंतर ध्यान हो गई और पुरोहित जी ने पुनः उसी मन्त्र का जाप प्रारम्भ कर दिया| ग्यारह वर्ष फिर व्यतीत हो गए| माता हिंगलाज पुनः प्रकट हुई और पुरोहित जी से कहने लगी ‘वरमब्रुही’| पुरोहित जी ने कहा माँ मुझे वह वर दो जिसकी प्राप्ति के लिए मै संकल्प करके आपके चरणों में बैठा हूँ| पुरोहित जी ने पुनः कहा हे माँ अगर मुझे वह वर प्रदान न हुआ तो मै सारा जीवन इसी तरह आपके चरणों में बैठे हुए व्यतीत कर दूंगा और कभी अपने घर वापिस नहीं जाऊंगा| करुणमयी माँ ने कहा हे विप्र, तेरी तपस्या से प्रसन्न होकर मै अपने दो बीर तुम्हे देती हूँ| से दोनों वीर लालबीर एवं अगाकड़ वीर बालकों का रूप बना कर आपके साथ जाएँगे | ये बालक आप रानियों की गोद में दे देना| इस से आपका संकल्प सिद्ध हो जायेगा और आपके यजमान को पुत्र की प्राप्ति हो जायेगी| माता ने आग आदेश देतो हुए कहा की इन वीरो को कोई भी अपशब्द न कहा जाये क्योकि ये वीर सहन नहीं कर पाएंगे तथा वापिस मेरे पास लौट आयेंगे ब्राह्मण देवता ने बड़े हर्ष पूर्वक मातेश्वरी के चरणों में प्रणाम करते हुए कोटिश : धन्यवाद किया और कहा की आपने मेरी प्रार्थना स्वीकार की है| आपकी कृपा से राजा को देव संता संतान प्राप्त हुई है | भला इन को अपशब्द कोंन कहेगा | फिर भी मैं आपका सन्देश राजा तथा रानियों तक पहुंचा दूंगा | पुरोहित जी के एसा कहने के पश्चात् माता हिंगलाज ने अपने वीरो को बुलाया और प्रोहित जी साठ जाने को काहा | प्रुहित जी एवं वीरों ने माता जी के चरणों में प्रणाम करके अपने नगर श्री दीपालपुर केऔर प्रस्थान किया | रस्ते में मुल्तान पड़ता था वहां राजा श्री चन्द्र के भाई नरसिंह भूप रहते थे | पुरोहित जी के मुल्तान पहुँचने पर राजा नरसिंह भूप को ज्ञात हो गया की पुरोहित जी की माता हिंगलाज के दो वीरो को राजा श्री चन्द्र के पुत्रो के रूप में ले जा रहे है | राजा नरसिंह भूप के मन में यह भावः था की मेरा भाई निःसंतान है | अतः उसका राजपाट मुझे ही मिलेगा लेकिन भाई के सान्तवना हो जाने से नरसिंह भूप के मन में द्वेषभाव उत्पन्न्य हो गया | उसने बीरो को मारने का निश्चय करके अपनी फौज को लेकर उनके साथ युद्ध प्रारंभ कर दिया |

घमासान युद्ध हुआ परन्तु वे तो माता के बीर थे | उनके साथ युद्ध में सफलता कैसे मील सकती थी ? उन बीरो ने नरसिंह भूप के सारे यौद्धा मर गिराये और पुरोहित जी सहित श्री दीपालपुर की और प्रस्थान किया | श्री दीपालपुर पहुँचने पर जी ने राजा श्री चन्द्र जी को सूचित किया की भगवती की अपार कृपा से ये दोनों वीर आपको पुत्र रूप में प्राप्त हुए है | शुभ मुहुत्र में पुरोहित जी ने श्री गणेश जी एवं भगवती हिंगलाज का पूजन करके दो बड़ी रानियों की गोद में एक एक बीर बैठा दिया | साथ ही पुरोहित जी ने राजा एवं रानियों को सूचित भी किया की ये बालक देव स्वरुप है | इन्हें कभी भी कोई अपशब्द कहना है | अन्यथा ये यहाँ नहीं ठहरेंगे और तत्काल अपनी माता के पास वापिस चले जायेंगे | राजा श्री चन्द्र को दोनों वीरो के पुत्र रूप में प्राप्ति हो जाने पर नरसिंह भूप के मन में और अधिक इर्ष्या और द्वेष की भावना जाग्रत हो गई | उन बीरो को समाप्त करने के लिए उसने तांत्रिक का सहारा लिया | ये तांत्रिक हड और हड्म्ब थे | नरसिंह भूप के कहने पर ये तांत्रिक दीपालपुर नगर के बाहर साधू बेश बनाकर , एक आश्रम में रहने लगे | नरसिंह भूप के कुछ लोगो ने दीपालपुर शहर में उन तांत्रिको की प्रशंषा करनी प्रारंभ कर दी | उन्होंने कहना शुरू कर दिया की ये तांत्रिक सब की मनोकामनाये पूर्ण करने में समर्थ है | इस तरह लोग उन तांत्रिको के पास आने जाने लगे | ये तांत्रिक बड़े होशियार थे उन्होंने अपने ही चेले – चपाटो द्वारा शहर में चोरिया करवानी शुरू कर दी | चोरी का जो सामान वो लाते , तांत्रिक के कहने के अनुसार साथ की झाडियों में उसको छुपा दिया जाता | जिन लोगो की चोरिया होती वे साधू वेश में बैठे तांत्रिक से आकर चोरियों के बारे में पूछते | साधू समाधी लगाकर तुंरत बता देते की आपका धन उस इस्थान पर मिलेगा क्योकि इस की जानकारी उनको पहले से ही होती थी | इस तरह उनकी प्रसिद्दि की चर्चा सारे शहर में होने लगी | एसे वातावरण का लाभ उठाते हुए नरसिंह भूप मुल्तान से अपने दोनों पुत्रो को साथ लेकर दीपालपुर आ गया | उसने अपने भाई राजा श्री चन्द्र को परामर्श दिया की यहाँ एक भगवती चंडिका का मंदिर निर्माण किया जाये जिस में ये साधू महात्मा तपस्या करेंगे और शरण में आने वाले लोगो का मनोरथ पूरे करेंगे | इस सारे षडयंत्र के पीछे नरसिंह भूप की एक चाल थी की किसी प्रकार भी इन वीरो का बध कर दिया जाए | माघ का महिना और शनिवार का दिन था | नगर में उन भेषधारी साधू तांत्रिक ने घोषणा करवा दी की रात को सब नगरवासी अपने पुत्रो के साथ नारियल व् तेल के पूड़े लाकर आये | बच्चो को महात्मा जी भगवती चंडिका की पूजा करके दीर्घ आयु का आर्शीवाद देंगे | उसी शनिवार की रात्रि को सभी अपने बच्चो को साथ लाकर चंडिका देवी मंदिर के आँगन में पहुँच गए | श्री भगवती हिंगलाज के वीर भी अपने माता के साथ वहां पहुंचे | नरसिंह भूप भी अपने दोनों बच्चो को लेकर वंहा आ गए | माता के दोनों वीर ज्ञानी जान थे | उनको सब ज्ञान था की यहाँ क्या होने वाला है | बच्चो के दादा एवं पिता का नाम लेकर उन्हें बुलाना प्रारंभ किया | ये भी आदेश दिए गए की जो बच्चा पूजा करके आयगा वह प्रवेश द्वार से मंदिर के अंदर प्रवेश करेगा और निकास द्वार से बाहर जायेगा | प्रथा होने पर देवी जी के दर्शन करके अपने माता-पिता के पास से मिलेंगे |

कार्य आरम्भ हो गया | वीर भौप गए की यह योजना हामारे बध के लिए बने गई है | उन्होंने देवी शक्ति से अपना स्वरुप नरसिंह भूप के पुत्रो जैसा बना लिया और अपना रूप उन्हें दे दिया | उन तांत्रिको ने नरसिंह भूप के पुत्रो वीरो जैसा समझ कर उनका बध कर दिया लेकिन वीर सुरक्षित बच गए | लकिन नरसिंह भूप को अपने पुत्र नहीं मिले | वो तांत्रिक वहां से रातो रत ही भाग गए नरसिंह भूप के न मिलने पर वह मंदिर में गए और अपने पुत्रो को मृत पाया | वे वीरो की शक्ति को पहचान गए | नरसिंह भूप तत्काल दोनों वीरो के चरणों गिर कर गिर कर प्रार्थना करने लगे की है दिव्य शक्ति संपन्न मेरे अपराधो को क्षमा करो और मेरे इन पुत्रो को जीवित कर दो नरसिह बूप के बार-बार विलाप करने पर उन देव स्वरुप वीरो ने कला डोरा (जिसको “बाबा जी का गंडा” भी कहा जाता है) उन मृत बच्चो के गले में बाँध कर जल सिंचिन किया जिससे दोनों बच्चे जीवित हो गए| बाबा जी ने सब राक्षसों का वध किया| हड़ और हडम्ब नामक राक्षसों के सिर काट कर खजूर के पेड़ पर लटका दिए| अतः स्पष्ट है की जो दूसरो का बुरा करता है उसका अपना भला असंभव है| इस तरह समय बीतता गया| एक दिन दोनों वीर अपने साथियो के साठ गेंद-बल्ला खेल रहे थे| अचानक गेंद जोर से सौतेली माँ के हाथो पर लगी| रक्त बहने लगा| सौतेली माँ पहले से ही उन वीरो से द्वेष करती थी| क्रोधित होकर उसने वीरो को कह दिया गरक जाओ (निघ्घर जाओ) अति क्रोध के कारण वह इस बात को भूल गई की पुरोहित जी ने इन्हें अपशब्द कहने के लिए मन किया था| यदि अपशब्द कहा गया तो ये अपनी माता के पास वापिस चले जायेंगे माता को क्रोधित देखकर तीन बार उसके मुह से कहलवा कर ‘गरक जाओ’, वीर उस स्थान पर पहुचे जहाँ उनका मंदिर निर्माण हुआ है| वीरो ने पृथ्वी माँ से प्रार्थना की कि अब हम यहाँ नहीं रह सकते हमे अपने में समां लो| उसी समय पृथ्वी फट गई और वीर उसमे समाने लगे| ऐसे द्र्श्य देखकर माता अति चिंतित हुई| सभी मताए उस स्थान पर पहुची एवं रोने लगी| उसी समय पुरोहीत जी भी वहां पहुँच गए| उनके पहुँचने तक वीर पृथ्वी में समां चुके थे और केवल छोटी ही शेष रह गई थी| पुरोहीत जी ने उन्हें छोटी से पकड़ लिया और पूछा की आप कहा जा रहे है? आपकी प्राप्ति के लिए मैंने इतनी साधना की कि मेरा यजमान पुत्रवान हुआ| मेरी तपस्या का यह फल कि जिससे में आज निराश हो रहा हूँ| वीरो की ओर से एक घोषणा हुई की विप्रवर चिंता मत करो| आप हमारे राज पुरोहीत तो है ही, क्योकि आज हमारी छोटी आप के हाथ में है, अतः आज से आप हमारे राज गुरु भी हो गए है| आपकी हुई तपस्या का इतना बल है कि जिसके द्बारा जिस माता ने हमे अपशब्द कहे है उसे आशीर्वाद प्रदान करो | आपके आशीर्वाद से वह पुत्रवती होगी और उसी पुत्र से ही सूर्यवंशी खन्ना वंश का प्रारंभ होगा| यह कार्यक्रम जो राक्षसों और तांत्रिको ने प्रारंभ किया था उसी प्रकार माघ महीने में जितने शनिवार होंगे हर शनिवार को सेवक जन आवाज़ पड़ने पर अपने बच्चो को मंदिर के अन्दर भेजेंगे और दुसरे दरवाजे पर माता पिता नहीं अपितु दुसरे सगे संबन्धी उनके बाहर आने की प्रतीक्षा करेंगे| रात भर बालक अपने माता पिता से नहीं मिलेंगे| प्रातः काल खजूर के पेड़ पर माथा टेक कर भगवती चंडिका के दर्शन करके ही बाबा जी के दर्शन करेंगे और बाद में अपने माता पिता से मिलेंगे| यह प्रथा इसी प्रकार आने वाली पीदियों में प्रचलित रहेगी| सेवक लोग जब जयकारा बुलाएँगे तो आप का नाम ‘बाबे’ पहले आएगा| बाबा शब्द ब्राह्मणों को संबोधित करने के लिए किया जाता है| इया तरह सेवब जन “बाबा लालू जसराय की जय” का जयकारा बुलाएँगे और भी क्षत्रिय जाति मेहरे, कपूर सेठ, महाजन इस मंदिर में कोई मन्नत मांगेंगे तो भगवती चंडिका देवी के आशीर्वाद से उनके मनोरथ पूरे होंगे| रविवार को बाबा जी को दूध वाला प्रसाद जिसको ‘कढाई’ कहा जाता है, अर्पण करेंगे| बाबा जी की शेय्या पर लाल शेजा और खिलोने चढाएंगे| जिन्होंने मत्था टेकने और चोल पहनाने की मन्नत मांगी होगी, वह सारा कार्य रविवार को ही होगा| जिन्होंने बच्चो के मुंडन करवाने की मन्नत मांगी होगी वो सोमवार को करवाएंगे| मंगलवार को यज्ञोपवीत संस्कार संपन्न होंगे| यह कार्यक्रम कई शताब्दियों से प्रारंभ है| बाबा जी बालक रूप है, जो सेवा पर शीघ्र प्रसन्न हो जाते है| बाबा जी को कोई मूर्ति नहीं है| वो ज्योति स्वरुप है इसी कारण १२ महीने बाबा जी की अखंड ज्योति प्रज्वलित रहती है| बाबा जी के मंदिर के आगे सदेव पर्दा लगा रहता है तथा निरंतर ज्योति के दर्शन होते है| सब कार्य प्रारंभ करने से पूर्व श्री मातेश्वरी चंडिका जी का पूजन होता है| मिलवाह (कार) रखा जाता है|जब तक छोटी आदि कार्य सम्पन्न न हो जाये दूध, दही हल्दी, चाकू का कटा हुआ पदार्थ एवं तेल प्रयोग नहीं किया जाता और पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है|
छोटी आदि संस्कार संपन्न करने के पश्चात बाबा लालू जसराय जी, चंडिका माई, बाबा छज्जल देव, बड़े बडेरो (पूर्वजो) की पूजा करके ही इन वस्तुओ को सेवन करने की आज्ञा होती है| बाबा जी बड़े दयालु है| पूर्वजो से श्रवण किया है की भाग्यशाली श्रद्धालुओ को उनके बालक रूप के दर्शन हुए है| कई यात्रियों का रात्रि के समय रास्ता भूल जाने पर बाबा जी ने उनको दीपक प्रदान किया और कहा की जिस ओर दीपक की लो जाये उसी तरफ निर्भय हो कर चलते जाओ आप बाबा जी के मंदिर पहुँच जाओगे| अब इस बात की आवश्यकता है की सब सेवक जन एवं श्रद्धालु मिलकर एक सम्मति बनाये की भारत सरकार द्वारा वीजा लेकर माघ के महीने में यह मेला दीपालपुर (पाकिस्तान) में मनाया जाये| सन् १९५० माघ के महीने में एक जत्था दीपालपुर गया था और खन्नो बालको की चोटियाँ भी बाबा जी के मंदिर में संपन्न हुई थी| इतवार को कढाई का प्रसाद भी अर्पण हुआ व भोग लगाया गया था| प्रातः स्मरणीय सारस्वत विप्रवंश श्री चन्द्र मुनिवंशज, परम श्रद्धेय बाबा हरी राम जी झीनगण भी जत्थे के साथ वहां पधारे थे|
‘सत् श्री बाबा लालू जसराय की जय’        -शुभम्-